अपडेट: Oct 25, 2026 04:59 PM
सड़क पर बैठे और विचरण करते निराश्रित मवेशी बन रहे दुर्घटनाओं का कारण, आखिर कब जागेगा प्रशासन?

रायपुर। छत्तीसगढ़ में शहरों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक सड़कों पर विचरण कर रहे निराश्रित मवेशी एवं निराश्रित गोवंश आज एक गंभीर जनसुरक्षा का विषय बन चुके हैं। प्रमुख मार्गों, बाजार क्षेत्रों, चौक-चौराहों, बाईपास, राज्य मार्गों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर बड़ी संख्या में निराश्रित गोवंश के सड़क पर बैठे या विचरण करते दिखाई देने की स्थिति आम होती जा रही है। कई स्थानों पर मवेशियों के झुंड सड़क के बीचों-बीच बैठे रहते हैं, जिससे वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाना पड़ता है या दुर्घटना से बचने के लिए वाहन को दूसरी दिशा में मोड़ना पड़ता है। इस समस्या के कारण होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है। रात के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि अंधेरे में सड़क पर बैठे काले या गहरे रंग के मवेशी वाहन चालक को समय पर दिखाई नहीं देते। तेज रफ्तार वाहन जब अचानक सामने आए निराश्रित गोवंश से टकराता है, तो दुर्घटना में वाहन चालक, यात्री और स्वयं पशु के गंभीर रूप से घायल होने अथवा जान जाने की आशंका रहती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब यह समस्या वर्षों से प्रशासन के सामने है और न्यायालय भी इस विषय पर गंभीरता व्यक्त कर चुका है, तब भी सड़कों पर निराश्रित गोवंश की मौजूदगी को रोकने के लिए प्रभावी और स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही है?

हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद स्थिति पर सवाल- सड़कों पर निराश्रित पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं का मामला न्यायालय तक पहुंच चुका है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी इस विषय को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक और प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। न्यायालयीन कार्यवाही में सड़क पर बैठे और घूमते पशुओं के कारण दुर्घटनाओं में मनुष्यों तथा पशुओं दोनों के प्रभावित होने की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई। संबंधित विभागों एवं प्रशासन को ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई गई जिससे सड़कों पर निराश्रित पशुओं की मौजूदगी कम हो और दुर्घटनाओं को रोका जा सके। इसके बाद शासन एवं प्रशासन के स्तर पर निर्देश जारी किए गए। संबंधित विभागों, जिला प्रशासन, नगरीय निकायों, पंचायतों, पुलिस तथा सड़क से जुड़ी एजेंसियों की भूमिका भी निर्धारित किए जाने की बात सामने आई।

लेकिन सवाल यही है कि क्या इन निर्देशों का वास्तविक असर जमीन पर दिखाई दे रहा है?

यदि प्रशासन द्वारा प्रभावी कार्रवाई की जा रही है तो शहरों और राजमार्गों पर आज भी निराश्रित गोवंश के झुंड क्यों दिखाई देते हैं? यदि निगरानी व्यवस्था मौजूद है तो दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में नियमित निगरानी क्यों नहीं हो रही? और यदि पशु पकड़ने की व्यवस्था है तो कुछ समय बाद वही मवेशी दोबारा सड़क पर कैसे पहुंच जाते हैं?

मुख्य सचिव स्तर तक पहुंच चुका है मामला- यह विषय केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं है। सड़क सुरक्षा और निराश्रित मवेशियों की समस्या को लेकर शासन के उच्च स्तर तक निर्देश जारी किए जाने की स्थिति सामने आ चुकी है। मुख्य सचिव स्तर पर संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाने के बावजूद यदि समस्या बनी हुई है तो यह व्यवस्था के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। किसी भी शासनादेश अथवा न्यायालयीन निर्देश की वास्तविक सफलता कागजों में नहीं बल्कि उसके जमीनी परिणाम में दिखाई देती है। यदि किसी सड़क पर प्रतिदिन निराश्रित गोवंश का जमावड़ा रहता है, वहां लगातार दुर्घटना की आशंका बनी रहती है और फिर भी संबंधित विभाग द्वारा स्थायी समाधान नहीं किया जाता, तो निश्चित रूप से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है? क्या लोगों की जान की कीमत नहीं? सड़क पर चलने वाला आम नागरिक यह उम्मीद करता है कि जिस सड़क का इस्तेमाल वह कर रहा है, वह कम से कम बुनियादी रूप से सुरक्षित होगी। लेकिन जब सड़क के बीचों-बीच निराश्रित मवेशी बैठे हों तो वाहन चालक के सामने अचानक एक ऐसा खतरा पैदा हो जाता है जिसे उसने स्वयं पैदा नहीं किया है। विशेषकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह स्थिति अत्यंत जोखिमपूर्ण हो सकती है। अचानक सामने आए पशु से बचने के प्रयास में बाइक असंतुलित हो सकती है। पीछे से आ रहा वाहन टकरा सकता है। सामने से आने वाला वाहन भी दुर्घटना की चपेट में आ सकता है। कई बार दुर्घटना का कारण सीधे तौर पर पशु से टकराना नहीं बल्कि पशु से बचने के प्रयास में वाहन का अनियंत्रित होना भी हो सकता है। ऐसे में सवाल केवल इतना नहीं है कि कितने वाहन मवेशियों से टकराए। सवाल यह भी है कि कितनी दुर्घटनाओं में सड़क पर मौजूद निराश्रित गोवंश अप्रत्यक्ष रूप से जोखिम का कारण बना? रात में बढ़ जाता है खतरा- निराश्रित गोवंश की समस्या दिन के मुकाबले रात में और अधिक खतरनाक हो जाती है। कई ग्रामीण मार्गों, बाईपास और हाईवे पर पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था नहीं होती। ऐसे में सड़क पर बैठे पशु वाहन चालक को काफी नजदीक आने के बाद दिखाई देते हैं। यदि वाहन की गति अधिक हो तो चालक के पास प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त समय नहीं रहता। दूसरी ओर, भारी वाहनों के मामले में स्थिति और गंभीर हो सकती है। ट्रक, बस या अन्य बड़े वाहन यदि अचानक ब्रेक लगाते हैं तो पीछे चल रहे वाहन भी दुर्घटना की चपेट में आ सकते हैं। इसलिए निराश्रित मवेशियों की समस्या को केवल पशु प्रबंधन का विषय मानना उचित नहीं होगा। यह सड़क सुरक्षा, यातायात प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ विषय है। आखिर निराश्रित मवेशी सड़कों पर आते क्यों हैं? इस समस्या का स्थायी समाधान तलाशने के लिए इसके कारणों को समझना भी जरूरी है। कई स्थानों पर पशु मालिक अपने मवेशियों को खुले में छोड़ देते हैं। भोजन की तलाश में ये पशु सड़कों, बाजारों और कचरा स्थलों तक पहुंच जाते हैं। नगरीय क्षेत्रों में खुले कचरे और खाद्य अपशिष्ट की उपलब्धता भी पशुओं को सड़क की ओर आकर्षित कर सकती है। इसके अलावा पर्याप्त और व्यवस्थित पशु आश्रय, गौशालाओं की क्षमता, पशुओं की पहचान, मालिकों की जवाबदेही तथा नियमित निगरानी जैसे विषय भी महत्वपूर्ण हैं। यदि केवल सड़क से पशुओं को हटाकर किसी दूसरे स्थान पर छोड़ दिया जाए और कुछ दिनों बाद वे फिर सड़क पर आ जाएं, तो समस्या का समाधान नहीं होगा। इसलिए सरकार को पशु पकड़ने से लेकर उनकी पहचान, सुरक्षित आश्रय, मालिक की जवाबदेही और नियमित निगरानी तक पूरी श्रृंखला को प्रभावी बनाना होगा। जिम्मेदारी तय करना जरूरी, सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जिम्मेदारी का है। यदि किसी सड़क पर बार-बार निराश्रित गोवंश जमा होता है, तो उस क्षेत्र की निगरानी कौन करेगा? पशुओं को हटाने की जिम्मेदारी किस विभाग की होगी? उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी होगी? पशु मालिक की पहचान कौन करेगा? सड़क पर पशु छोड़ने की स्थिति में कार्रवाई कौन करेगा? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं होंगे, तब तक समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल रहेगा। जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक नगरीय निकाय, पंचायत क्षेत्र और प्रमुख सड़क के लिए जिम्मेदार अधिकारी एवं टीम की स्पष्ट पहचान हो। शिकायत मिलने पर कितने समय में टीम मौके पर पहुंचेगी, पशु कहां ले जाए जाएंगे और आगे उनकी देखभाल कौन करेगा—इन सभी विषयों की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। केवल अभियान चलाने से नहीं निकलेगा समाधान- अक्सर प्रशासन द्वारा समय-समय पर निराश्रित पशुओं को पकड़ने के अभियान चलाए जाते हैं। कुछ दिनों तक सड़कें अपेक्षाकृत खाली दिखाई देती हैं, लेकिन फिर वही स्थिति लौट आती है। इससे स्पष्ट है कि समस्या का समाधान केवल अभियान आधारित नहीं बल्कि स्थायी प्रबंधन व्यवस्था के माध्यम से किया जाना चाहिए। हर जिले में ऐसे क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां सड़क पर निराश्रित गोवंश की संख्या अधिक रहती है। इन स्थानों पर नियमित निगरानी, पशु पकड़ने वाली टीम, हेल्पलाइन, स्थानीय निकाय की जवाबदेही और पशु मालिकों की पहचान जैसी व्यवस्था की जा सकती है। आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? निराश्रित मवेशियों के कारण दुर्घटनाओं को लेकर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग दावे सामने आते हैं। कई बार कहा जाता है कि इनके कारण बड़ी संख्या में दुर्घटनाएं हो रही हैं। लेकिन इस समस्या की वास्तविक गंभीरता समझने के लिए सरकार को आधिकारिक और जिला-वार आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए।

कितनी दुर्घटनाएं निराश्रित गोवंश के कारण हुईं? कितने लोग घायल हुए? कितने लोगों की मृत्यु हुई? कितने पशु दुर्घटनाओं में मारे गए? कितने निराश्रित मवेशी पकड़े गए? कितने पशु सुरक्षित आश्रय स्थलों तक पहुंचाए गए? कितने पशु मालिकों की पहचान हुई? और कितने मामलों में कार्रवाई की गई? इन आंकड़ों के सार्वजनिक होने से समस्या की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी और यह भी पता चलेगा कि शासन की वर्तमान व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

हाईकोर्ट के आदेश का सम्मान और क्रियान्वयन दोनों जरूरी- न्यायालय द्वारा किसी विषय पर निर्देश दिए जाने का उद्देश्य केवल अधिकारियों को आदेश देना नहीं होता, बल्कि नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी होता है। इसलिए न्यायालयीन निर्देशों के बाद संबंधित विभागों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे प्रभावी कार्रवाई करें और उसकी नियमित समीक्षा भी करें। यदि कोई व्यवस्था कागज पर तैयार है लेकिन उसका पालन जमीन पर नहीं हो रहा है, तो उसकी समीक्षा आवश्यक है।

प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि पहले जारी निर्देशों का कितना पालन हुआ और जहां पालन नहीं हुआ वहां क्या कारण रहे।

इंसान और पशु दोनों की सुरक्षा जरूरी- इस पूरे मुद्दे को केवल “मवेशियों को सड़क से हटाने” के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। निराश्रित गोवंश भी सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो रहा है। कई पशु वाहनों की चपेट में आकर घायल होते हैं या उनकी मौत हो जाती है। इसलिए प्रभावी व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे इंसानों के साथ-साथ पशुओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। सड़कों से पशुओं को हटाकर उन्हें सुरक्षित आश्रय देना, पर्याप्त चारा-पानी उपलब्ध कराना और पशु चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। जनता प्रशासन से किसी असंभव व्यवस्था की मांग नहीं कर रही। मांग केवल इतनी है कि जिस समस्या को वर्षों से देखा जा रहा है, उसका स्थायी और प्रभावी समाधान किया जाए। जिन सड़कों पर निराश्रित गोवंश की संख्या अधिक है, वहां नियमित पेट्रोलिंग हो।

जहां आवश्यकता है वहां प्रकाश व्यवस्था बेहतर की जाए।

दुर्घटना संभावित स्थानों पर चेतावनी संकेत लगाए जाएं।

निराश्रित मवेशियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए पर्याप्त टीम बनाई जाए।

पशु मालिकों की पहचान कर उन्हें जिम्मेदार बनाया जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण—जहां लापरवाही सामने आए, वहां जिम्मेदारी तय हो।

अब सवाल जवाब का है

छत्तीसगढ़ में सड़कों पर निराश्रित मवेशियों की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। हाईकोर्ट द्वारा इस विषय पर चिंता व्यक्त किए जाने और प्रशासनिक स्तर पर निर्देश जारी होने के बाद भी यदि स्थिति पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो पा रही है तो सरकार को यह बताना चाहिए कि समस्या के समाधान में बाधा कहां है।

क्या आदेशों के बावजूद कार्रवाई कमजोर है? क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी है? क्या पर्याप्त पशु आश्रय उपलब्ध नहीं हैं? क्या पशु मालिकों की जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है? क्या सड़क सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी नहीं हो रही है? या फिर सबसे गंभीर सवाल—क्या किसी बड़ी जनहानि का इंतजार किया जा रहा है? इन सवालों का जवाब जरूरी है।

क्योंकि सड़क पर बैठा हुआ निराश्रित गोवंश केवल यातायात में बाधा नहीं है। वह एक संभावित दुर्घटना का कारण बन सकता है। उस दुर्घटना में एक परिवार अपना सदस्य खो सकता है और एक पशु भी अपनी जान गंवा सकता है।

इसलिए अब आवश्यकता केवल बयान जारी करने या कुछ दिनों के लिए अभियान चलाने की नहीं है। आवश्यकता है समयबद्ध, जवाबदेह और स्थायी व्यवस्था की। सरकार और प्रशासन को हाईकोर्ट के निर्देशों तथा पहले से जारी प्रशासनिक आदेशों की समीक्षा करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सड़कों पर निराश्रित मवेशियों की समस्या को जमीनी स्तर पर नियंत्रित किया जाए। आखिर सवाल किसी एक विभाग का नहीं, हर उस नागरिक की जिंदगी का है जो रोज इन सड़कों से गुजरता है।

जनता का सवाल बिल्कुल स्पष्ट है- जब प्रशासन को खतरा दिखाई दे रहा है, न्यायालय भी निर्देश दे चुका है और शासन के स्तर पर आदेश भी जारी हो चुके हैं, तो फिर सड़कों पर निराश्रित गोवंश के कारण पैदा हो रहे खतरे का स्थायी समाधान कब होगा?

अब समय है कि इस सवाल का जवाब कागजों में नहीं, सड़कों पर दिखाई दे।

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